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क्या टिकैत के आंसू मथुरा में सैलाब बन कर उमड़े?

किसान नेता राकेश टिकैत की आँख से निकले आंसुओं ने किसानों में एक बार फिर जान फूंक दी है और किसान आंदोलन पूरी तरह से अपने शबाब पर है. राकेश टिकैत ने बीते दिनों पुलिस की ओर से प्रदर्शन स्थल खली कराये जाने के बाद जो वक्तव्य दिए और जिस तरह जज्बाती अंदाज में उन्होंने कहा कि मैं फांसी लगा लूंगा. मैं आंदोलन स्थल से नहीं जाऊंगा. मैं मर जाऊंगा और उसके लिए प्रशासन जिम्मेदार होगा और उन्होंने सरकार को घेरने की कोशिश की उसके बाद जैसे ही उनकी आंख से आंसू टपके पूरे देश के किसानों में आक्रोश प्रकट हो गया और सरकार के प्रति उनके मन में काफी गुस्सा देखने को मिला.

By: मोहम्मद अहमद

 

  • क्या टिकैत की आंसू मथुरा में सैलाब बन कर उमड़े?

 

किसान नेता राकेश टिकैत की आँख से निकले आंसुओं ने किसानों में एक बार फिर जान फूंक दी है और किसान आंदोलन पूरी तरह से अपने शबाब पर है. राकेश टिकैत ने बीते दिनों पुलिस की ओर से प्रदर्शन स्थल खली कराये जाने के बाद जो वक्तव्य दिए और जिस तरह जज्बाती अंदाज में उन्होंने कहा कि मैं फांसी लगा लूंगा. मैं आंदोलन स्थल से नहीं जाऊंगा. मैं मर जाऊंगा और उसके लिए प्रशासन जिम्मेदार होगा और उन्होंने सरकार को घेरने की कोशिश की उसके बाद जैसे ही उनकी आंख से आंसू टपके पूरे देश के किसानों में आक्रोश प्रकट हो गया और सरकार के प्रति उनके मन में काफी गुस्सा देखने को मिला.

 

 

 

 इसके बाद से किसान पूरे देश में और विशेषकर उत्तर प्रदेश राजस्थान पंजाब हरियाणा और दिल्ली में लामबंद हो रहे हैं. आज मथुरा में लाखों की संख्या में किसान जमा हुए. आम आदमी पार्टी के नेता और सांसद राज्यसभा संजय सिंह ने ट्वीट करके जानकारी देते हुए कहा कि "भाजपा ने देश के किसानों को गद्दार और देशद्रोही कह कर उन्हें अपमानित किया है."

 

 

 उन्होंने कहा कि "भाजपाइयों को देखना होगा कि मथुरा का नजारा क्या है, अब पूरे देश का किसान भाजपा के खिलाफ लामबंद हो रहा है".

 

 

 ज्ञात रहे कि इस तरह की भी खबरें आ रही हैं कि किसान अब पूरी ताकत के साथ सरकार द्वारा लाए गए तीनों बिल का मुकाबला करेंगे. वहीं सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि कृषी मंत्री की ओर से किसानों को दिया गया ऑफर अब भी मौजूद है, अगर किसान चाहें तो उसे स्वीकार कर सकते हैं.

 

 

प्रधानमंत्री की ओर से मीडिया में बयान आ रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि किसानों और उनके बीच सिर्फ एक काल की दूरी है, लेकिन अब सवाल यही पैदा होता है कि आखिर यह दूरी कब खत्म होगी? कब किसानों और सरकार के बीच बना डेड लॉक डायलॉग में परिवर्तित होते हुए अपने अंजाम तक पहुंचेगा और किसान अपने घरों को जायेंगे.

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