देवबंद में अल्लाह अल्लाह और दिल्ली राम राम

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सादिक साबिरी अल्बेह्वाटी (मोहल्ला अबुल माआली देवबंद) 

ज़िला सहारनपुर तिथि 11 जून 1983, राहत देवबंद   

 

 

ऐ अमीरे मुल्को मिल्लत ऐ हरीसे इज़ व जाह- ऐ मुसलमानों की खुशहाली के सरकारी गवाह

आपका शजरा असीलुन्नसब शख्सियत डबल- मीडियम क़द, मौलवी चेहरा वजन 2 क्विंटल

मुस्तक़िल पेशा सियासत शौक़ तंदूरी चिकन-आप को मालूम है पीरी मुरीदी का भी फन

एक मुफलिस कौम के लीडर का जो होता है हाल- आप का जुगराफिया है उस की एक नादिर मिसाल

जितने मुर्शिद और लीडर आज हैं सारे फोजूल- आप तन्हा करते इस आर्ट के पैसे ओसूल

साफ़ सुथरा सेक्युलर है आप का तकिया कलाम- देवबंद में अल्लाह अल्लाह और दिल्ली राम राम

तेल मिल अखबार कालूनी मदरसा अस्पताल- आप हर उन्वान से रोज़ी कमाते हैं हलाल

हर मुसलमां के जुबां पर आप का ही नाम है- इस क़दर सच बोलना बस आप का ही काम है

कौम पर हैं आप के एहसान यूं तो बेशुमार- हालिया कुछ कारनामे हैं बहुत ही शाहकार

आप अगर बग़दाद जा कर खुद ना करते इंकेशाफ- जाने क्या नोटिस लिया जता हुकूमत के खिलाफ

लाख चिल्लाते फिरें आसाम के खाना बदोश- आप क्यों होते खुदा ना खस्ता मिल्लत फरोश

कौम फाके से मरे या हो कहीं भी कत्ले आम- मौत बरहक़ है समझते ही नहीं पागल आवाम

आपका यह कौल सच्चा और सब बेकार हैं- खुद मुसलमां अपनी बर्बादी के जिम्मेदार हैं

कौन कहता है कुर्बानी है झूठी आपकी- बेगुनाहों के लहू में तरह है रोटी आपकी

अब बताओ “अल-जमीयत” भी गलत छपने लगा- आपका फरमान कुछ था और यह कुछ बकने लगा

गो हकीकत कुछ सही यह आपका इरशाद है- ऐसी बेबुनियाद बातों की यही बुनियाद है

अलीगढ़ मेरठ मुरादाबाद में मातम सही- आपका मनसब सलामत अपने क़ातिल हम सही

आपकी तहक़ीक़ है शक व शुब्हे से बलातर- आप की तस्दीक से ही छपती है सारी खबर  

वह बड़ौदा और मेरठ हो कि हो जमशेदपुर- आपने हर शहर में पाया मुसलमा का कुसूर

कितना बोगस था मुरादाबाद राइट का जवाज
“एक सूअर से कौनसी मख्दूश हो जाती नमाज
किस लिए बदजन हैं यह 99 फीसद मुरीद
आप हैं सरकार के उनके नहीं हैं ज़र खरीद
यह तो दुनिया है सभी की अपनी-अपनी राय है
आपको किबला जो कहता है वह खुद शो बॉय है
आप पर तनकीद करने का किसी को क्या मजाज़
है सभी की हद मुकर्रर आप की रसीद दराज़
ता कयामत आपको रखे खुदा इस हाल में
नेकियां ही नेकियां हैं नमाए आमाल में
हो चुकी जब हद मुसलमानों के इस्तेह्साल की
कट चुकीं जब हर तरफ फसलें “बिकाऊ माल” की
आपने फ़ौरन बुलाया मुंबई कन्वेंशन
हाय क्या तकरीर थी क्या मूड था क्या एक्शन
किस बला का जोश था तहरीक के एलान में
जलजला सा आ गया सरकार के एवान में
मुल्को मिल्लत आप की तहरी क्या तूफान था
वह सभी कुछ मिल गया जिसका हमें अरमान था
चूँकि मकसद नेक था सब लोग साथी हो गए
सूखकर मिलत के गम में आप हाथी हो गए
हो ना हो कुछ इस बहाने यह तो धंधा हो गया
क़ब्ल (पहले) अज़ (से) तहरीक 5200000 चंदा हो गया
आज के लीडर तो डर जाते हैं बाईकाट से
है कोई जो इस तरह चंदा हड़प ले ठाट से
बा वजू सब मुन्तज़िर हैं आप किब्ला हुक्म दें
हम नमाज़े शुक्र मेरठ या बड़ोदा में पढ़ें
आप जैसा सूरमा वह कौन है माई का लाल
कौम सूली पर चढ़ा कर जो नमक कर दे हलाल
एक आधा गुल खिलाया हो तो बतलाए कोई
आबी हजारों कारनामे कैसे गिनवाए कोई
किस हुनर से आपने हथिया लिया दारुल उलूम
आपके इस ऑपरेशन की है दुनिया भर में धूम
जश्ने सद साला से थी इस पर हुकूमत की नजर
आप भी तशकील फर्मा ही चुके थे मोत्मर (कॉन्फरन्स)
दीं की खिदमत को कुछ गुंडे बुलाए आपने
मादरे इल्मी के सब एहसां चुकाए आपने
यह मदरसा वक्फ़ है तालीम व मकसद मजहबी
आप इसे कमी बताएं या कहें सोसाइटी
लेकिन हजरत जी मजे में मौत को मत भूलिए
चंद सासें म्न्सबी लेकर ना इतना फूलिए
आपने जिस दिन किया तलबा से तहरीकी ख़िताब
खैर बाद ऐ ज़ुह्दो तक़वा ज़िंदा बाद ऐ इंक़ेलाब
अल्फेराक़ ए इल्म उस्तादों कि अब क्या हैसियत
जानते हैं आज सब शागिर्द अपनी अहमियत
सबको खुश फहमी है यह धंधा हमारे दम से है
बल्कि मुस्लिम कौम ही जिंदा हमारे दम से है
मुन्ताजिम मसरूफ हैं तलबा के इस्तेक़बाल में
मोहतमिम शूरा मुदर्रिस सब हैं अपनी खाल में
बे पढ़े अब फेल हो जाने की सूरत कुछ नहीं
इम्तेहां अब हो ना हो इसकी जरूरत कुछ नहीं
दीनियात व मंतिक व तफ़सीर व कलाम
फारसी मुस्लिम बुखारी तिरमिज़ी सबको सलाम
इसको कहते हैं मुसावी जिंदगी की झलकियां
मुर्गा अंडे दे रहे हैं और अजानें मुर्गियां
आपसे पहले जो सूफी मौलवी दुर्वेश थे
वह न दानिशमंद ताजिर थे न दूरंदेश थे
उनको क्या मालूम था बिजनेस है किस चिड़िया का नाम
सूद जैसी शर्तिया आमद को कर बैठे हराम
वह तो कहिए आपने खुलवाकर “मुस्लिम फंड ट्रस्ट”
सूद कानूने शरीयत में किया खुद एडजेस्ट
अब किसी मुफ़्ती के फतवे पर कोई बदजन नहीं
हर जरूरतमंद आदी हो चुका उलझन नहीं
बस इसी बुनियाद पर कायम है सारा कारोबार
यह सियासत यह रियासत यह नुमाइश यह बहार
“सूद अतिया (तोहफ़ा) है” बहुत सोशल है यह ईजाद भी
“बागबा भी खुश रहे राजी रहे है सय्याद भी
यह मुसलमां आपसे किस मुंह से करते हैं गिला
मांगते हैं कौन से उसने हुस्ने सआदत का सिला
आप जो कुछ है हुकूमत की नवाजिश से बने
और जमीयत के सदर खुद अपनी काविश से बने
कोई इंदिरा जी से पूछे कद्रो कीमत आपकी
क़द्र गौहर शाज़ वो नादिर क्या बताएं जौहरी

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति वतन समाचार उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार वतन समाचार के नहीं हैं, तथा वतन समाचार उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.


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