मुशावरत को बनाने में हिन्दू नेता, डॉ जाफर उल इस्लाम का डीएनए और मौजूदा अध्यक्ष

watansamachar desk
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पूर्व लोकसभा सांसद और वरिष्ठ नेता इलियास आजमी ने “वतन समाचार” से विशेष बातचीत में ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिसे मुशावरत से संबंधित कई चौंकाने वाले इंकेशाफ किए हैं. इलियास आजमी ने वतन समाचार से बातचीत ने बताया कि सिर्फ ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिसे मुशावरत ने अपने असल बानी डॉक्टर अब्दुल जलील फरीदी को ही नहीं भुलाया है, बल्कि उन लोगों को भी भुला दिया है जो फरीदी के साथ ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिसे मुशावरत को बनाने और उस के प्रचार में शामिल थे जिन में कई हिंदू नेता और दलित नेता भी शामिल थे, लेकिन ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिसे मुशावरत ने उन सबको भुला दिया है.

 

ज्ञात रहे कि ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिसे मुशावरत ने अपने संस्थापकों की सूची में डॉक्टर अफरीदी से लेकर किसी हिंदू नेता का नाम शामिल नहीं किया है. आज़मी ने बातचीत में बताया कि अगर ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिसे मुशावरत के बनाने में सिर्फ कोई एक नाम लिया जाएगा तो वह अकेला नाम डॉक्टर अब्दुल जलील फरीदी का होगा. उन्होंने बताया कि ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिसे मुशावरत की रूप रेखा तैयार करने के लिए जिन लोगों ने शुरुआत की थी उनमें एक अहम नाम पंडित सुंदरलाल का भी था.

 

 

इलियास आज़मी के अनुसार ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिसे मुशावरत को बनाने के बाद जिन लोगों ने उसके थॉट को फैलाने में अहम किरदार अदा किया उनमें  अटल सरकार में मंत्री रहे संघ प्रिय गौतम, छेदी लाल साथी और राम जी राम शामिल थे. एक सवाल के जवाब में आज़मी ने कहा कि जहां तक रही बात डॉक्टर फरीदी को भुलाने की तो आज ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिसे मुशावरत उन लोगों के हाथों में है जिन्होंने शुरू से ही ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिसे मुशावरत का विरोध किया था.

 

आज़मी ने एक और सवाल के जवाब में बताया कि जहाँ तक रही बात डॉक्टर ज़फर उल इस्लाम के जरिये ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिसे मुशावरत के संस्थापकों की सूची से डॉक्टर फरीदी का नाम हटाने की तो इसमें भी कोई बड़ी बात नहीं होनी चाहिए. डीएनए का कोई ना कोई असर होता ही है. डॉक्टर ज़फर उल इस्लाम के पिता शुरू से ही ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिसे मुशावरत के खिलाफ लिखते रहे हैं.

 

अपने ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिसे मुशावरत और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड से अलग होने के सवाल पर इलियास आजमी ने कहा कि मैं शुरू से ही ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिसे मुशावरत और बोर्ड का सदस्य था, लेकिन जब मौलाना अली मियां नदवी ने मुझे और मेरे साथ जावेद हबीब और ज़फर-याब जिलानी समेत कुछ लोगों को बोर्ड से अलग करने को अपनी अना का मसला बना लिया तो मीटिंग में काफी हंगामा हुआ.

 

 

मै ने मीटिंग में यह बात उठाई कि मुझे बोर्ड अलग नहीं कर सकता है, क्योंकि मै बोर्ड में मुस्लिम मजलिस के प्रतिनिधि के तौर पर हूँ और अगर मुस्लिम मजलिस चाहे तो अपना प्रतिनिधि बदल सकती है, लेकिन बाद में हमने यह फैसला किया कि अली मियां साहब की एक शख्सियत है इसलिए उसको बचाने के लिए हमें खुद को अलग कर लेना चाहिए. अली मियां विरोध की वजह थी, कि हम पीरी-मुरीदी के खिलाफ थे और हम ने कई बार वह फैसले नहीं होने दिए जो कुछ बा-असर लोग चाहते थे, और मौलाना अली मियां ने हम लोगों को हटाने के लिए अना का मसला बना लिया था इस लिए हम ने अलग होना ही मुनासिब समझा.


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