नए रास्तों से होकर गुज़रता हुआ समाजवाद

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आमिर अंसारी की कलम से …

 

यूं तो समाजवादी थ्योरी समता-मूलक समाज के साथ सैंकड़ों सालों से अपनी लोकतांत्रिक उसूलों की खुशबू लिए हुए दुनिया में गामज़न है, लेकिन 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के बाद से लोकतांत्रिक परंपराओं की रक्षा के नाम पर डॉ राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, अचुत पटवर्धन, अरुणा आसफ़ अली जैसे दर्जनों स्वतंत्रता संग्राम के योद्धाओं ने कांग्रेस से अपना दामन अलग कर के लोहिया और नरेंद्र देव के नेत्रत्व में सोशलिस्ट पार्टी का गठन किया और सोशलिस्टों की एक बड़ी जमात गांधी और मार्क्स के बीच एक रास्ता बनाकर राजनीतिक सफ़र पर निकल पड़ी तथा बुद्धिजीवी वर्ग में सोशलिस्टों का यह दबदबा क़ायम हुआ कि ज्यादतर अखबारों में पत्रकारों के रूप में समाजवादी नजर आए.

 

शिक्षाविद और समाजशास्त्रीयों के रूप में अपने काँधे पर झोले टाँगे हुए सोशलिस्टों ने अपनी पहचान बनाई गोया कि बिना कलफ का खादी भंडार का कुर्ता पायजामा, सादा जीवन उच्च विचार का पालन कुज़ात गांधीवादीयों के रूप में सोशलिस्ट विचारधारा कहलाई | इस आन्दोलन में किशन पटनायक जैसे चिन्तक सांसद पैदा हुए, कर्पूरी ठाकुर जैसे साधरण सेन समाज के घर में एक अच्छे प्रशासक पैदा हुए, जार्ज फर्नांडिस के रूप में मजदूर का सच्चा दर्द अपने सीने में लिए हुए दुनियाँ के सबसे बड़े मजदूर लीडर पैदा हुए, मधुलिमय के रूप में बौद्धिक संपदा के धनी और कलम के बादशाह ने जन्म लिया.

 

 

सोशलिस्ट विचारधारा ने ही राजनारायण जैसे फक्कड़ लेकिन संकल्प और संघर्ष की प्रतिमा को देश को दिया था जिन्होंने अपने वक़्त की सबसे ताक़तवर नेता और विचारधारा को रायबरेली के मैदान में अपनी फकीरी से पराजित कर दिया था | कहना यह चाहते है कि समाजवादियों के पास जो वैचारिक शक्ति थी उसने बहुत सारे ऐसे लीडर पैदा किये जिन्होंने सत्ता और सियासत में अपना अहम् मुकाम बनाया उनमे चंद्रशेखर, मुलायम सिंह, लालू यादव, शरद यादव, रामविलास पासवान, रघु ठाकुर और सुनीलम जैसे सैकड़ों लोग सोशलिस्ट विचारधारा की पहचान बनकर आज भी अलग-अलग रूपों में अपने व्यक्तित्व से कोई न कोई पहल शोषण मुक्त समाज की तामीर के लिए करते रहते हैं.

 

 

लेकिन समाजवादी आन्दोलन का चौथा पड़ाव अखिलेश यादव के नेतृत्व में देश के सबसे बड़े सूबे में पराजित होकर नई विजय के साथ हिन्दोस्तान के नक्शे पर फैलता नज़र आ रहा है उससे लोगों ने बहुत उम्मीदे जोड़ ली हैं, कुछ चीज़ों में अखिलेश यादव जिस साफ़गोई से आने सिद्धांत का बखान करते हैं बस वही लोहिया का आचरण और विचार है.

 

 

 

जिस गठबंधन को देश के पूंजीवादियों ने एक षड्यंत्र के तहत तबाह कर दिया था आज उसी गठबंधन ने फिर अप्रत्यक्ष रूप से जन्म लेकर हिन्दोस्तान की सियासत को एक ऐसा सन्देश दिया है जिससे यह अहसास हो रहा है कि अब देश में बसे हुए सर्वहारा और शोषित वर्ग को न केवल इन्साफ मिलेगा बल्कि सत्ता में हिस्सेदारी का अवसर भी, उप्र में समाजवादियों की जीत सिर्फ 2 संसदीय क्षेत्रों की विजय नहीं है बल्कि इस बात का एलान है कि कल का टूटा हुआ रिश्ता आज मज़बूत हो जाता है तो उन तमाम बागीचों में बहार आने की संभावना है जिन्होंने जमाने से बहार नहीं देखी है और एक खौफजदा माहौल में अपनी जिंदगी बसर कर रहे हैं और नफ़रत की सियासत के खिलाफ देश में मोहब्बत का पैगाम अखिलेश यादव की आने वाली सियासत का सुनहरा इतिहास बन कर भारतवासियों को रास्ता दिखाएगा लेकिन अखिलेश यादव को भी खुशामदियों,खुदगर्जों और पूंजीवादी दलालों से होशियार रहना होगा यही फार्मूला उन बहन जी पर भी लागू होता है जिन्होंने साम्प्रदायिक अवसर वादियों से जंग में अपना सब कुछ लुटा दिया है और अब नए कल की शुरुवात कर रही है.

 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति वतन समाचार उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार वतन समाचार के नहीं हैं, तथा वतन समाचार उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.


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