*इतिहास के थोड़े से समय को छोड़ कर नारी हमेशा पीड़ित या मज़लूम ही रही है। धर्म के नाम पर भी महिलाओं के अधिकारों पर डाका डाला गया है। दीन ए इस्लाम ने औरतों को जो अधिकार दिए थे और इस्लाम के पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. अ. व. ने जो ऊँचा स्थान एवं सम्मान दिया था, मुसलमानों ने भी उन तालीमात पर पूरी तरह अमल न कर के अपनी भी रुसवाई का सामान किया और दीन ए इस्लाम की बदनामी का कारण भी बने।
*आसमानी दीन के नाम पर बाक़ी सभी धर्म जो आज मौजूद हैं, उन में तो नारी को मानवीय स्तर से भी नीचे गिरा दिया गया है। औरत पर अत्याचार, ज़ुल्म व सितम धर्मों की बदली हुई और अमानवीय अर्थात ग़ैर इंसानी तालीमात का नतीजा भी है। परन्तु आज के लोकतांत्रिक समाज में, जहाँ ग्राम पंचायत से लेकर संसद तक और एक चपरासी से लेकर सर्वोच्च पदों तक औरत की पहुँच हो चुकी हो। जिस राजतंत्र और सिस्टम का दावा हो कि उसने महिलाओं को बराबरी का अधिकार देकर मर्दों के साथ ला खड़ा किया है। यदि उसी सिस्टम के भीतर औरतों पर अत्याचार और ज़ुल्म होता है और उसके साथ अमानवीय व्यवहार होता हो तो आश्चर्य होना लाज़मी है।
*ज़माना जिस क़दर तरक़्क़ी कर रहा है, उसी रफ़्तार से अपराध भी बढ़ता जा रहा है। इस मामले में हमारा महान भारत कुछ ज़्यादा ही तरक़्क़ीयाफ़्ता है। "बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ" और ''मेरा ईमान नारी सम्मान'' जैसे मनमोहक नारों के बाद तो महिलाओं का बलात्कार और उन के साथ दुर्व्यवहार कई गुणा अधिक हो गया है। महिलाओं का अपहरण, बलात्कार और उसके बाद उनकी निर्मम हत्या, यह सारी घटनाएं आपको सभी केसों में देखने को मिलेंगी। आप हर मामले में यह भी पाएंगे कि पीड़िता का संबंध दलित, पिछड़ा समाज या मुस्लिम तब्क़े से होगा। जब कि उत्पीड़क यानी ज़ालिम उच्च जाति का होगा और सत्ताधारी पार्टी से उसके रिश्ते होंगे।* *महिलाओं के उत्पीड़न और उन पर होने वाले ज़ुल्म व सितम के अनेक कारण हैं। जिन पर हमें गंभीरता से विचार करना चाहिए। मेरे ख़याल से सब से पहला कारण जैसा कि मैंने अपने दूसरे वाक्य में ही इशारा किया, मज़हब के नाम पर जो विचार समाज में पाए जाते हैं वह ध्यान देने योग्य हैं। जिस धर्म में स्त्रियों की गिनती पशुओं के बाद आती हो, जिसे ख़रीदा और बेचा जा सकता हो, या जिसे विरासत में बांटा जा सकता हो, जहाँ उन्हें गुनाहों की देवी और पाप की जननी कहा जाता हो, जहां उसकी शक्ल देख लेने भर से नेकियाँ बरबाद हो जाती हों, जहाँ जन्नत से निकलवाने का आरोप औरतों पर लगाया जाता हो। उस धर्म और कल्चर के मानने वाले मर्दों से महिलाओं के सम्मान की अपेक्षा करना फ़िज़ूल है। और दुर्भाग्य से यदि उस महिला का ताल्लुक़ मुस्लिम, दलित या शूद्र वर्ग से हो तब तो वह हर तरह से हलाल है। रेप की शिकार औरतों की 80-90 प्रतिशत तादाद उसी वर्ग और समाज से है।*
*भारत जैसे धर्म प्रधान देश में किसी भी धर्म की यह शिक्षा अपना असर ज़रूर दिखाती है। मुस्लिम लड़कियों के साथ ये बर्बरता में शामिल अधिकतर स्थानों पर ऊँची जाति के लोग ही होते हैं, बहुत ही कम घटनाएं ऐसी हैं जहां कुकर्मियों का रिश्ता मुसलमानों से है। लेकिन मुसलमानों के ताल्लुक़ से यह बात संतोषजनक है कि उनका दीन महिलाओं के शोषण का समर्थन नहीं करता।* *औरतों पर अत्याचार का दूसरा बड़ा कारण देश में क़ानून नाफ़िज़ करने और न्याय करने वाली संस्थाओं में करप्शन और घूसख़ोरी की कुप्रथा है। हम सब यह बात भलीभांति जानते हैं कि करप्शन के मामले में पुलिस कम नहीं है। यहां बड़े से बड़ा अपराधी पैसे देकर छूट जाता है। यहां थोड़ी सी लालच में निर्दोष व्यक्ति को पुलिस द्वारा जेल की काल कोठरी में डाल दिया जाता है, यहाँ सत्ताधारी पार्टी के नेताओं के दबाव में पुलिस अपनी ड्यूटी से भी मुंह मोड़ लेती है। जब किसी देश में क़ानून के रक्षक ही अपना फ़र्ज़ न निभाएँ तो उस देश में इस प्रकार की घटनाओं को कैसे रोका जा सकता है।*
*आप जिस केस को चाहें उठाकर देख लें। सब से पहले तो पुलिस FIR लिखने को ही तैयार नहीं होगी और यदि मजबूर हो कर लिखेगी भी तो अपराधी के लिए बच निकलने का रास्ता छोड़ पीड़ित को ही मुक़दमे में फ़ांस लेगी। उन्हें डराएगी धमकाएगी और यदि किसी तरह मामला अदालत तक पहुंच गया तो गवाहों का न मिलना तो निश्चित है। न्याय प्रणाली की जटिलताएं मुक़दमों के बरवक़्त फैसले की राह में रुकावट बन जाती हैं। इंसाफ़ मिलने वाली देरी अपराधियों के हौसले बढ़ाती है।*
हर किसी का मुक़द्दर निर्भया जैसा नहीं होता कि सारा देश उसके साथ खड़ा हो जाए और अदालत को तुरंत न्याय देने पर विवश होना पड़े। दुर्भाग्य यह है कि निर्भया के समय में जो लोग उसको इंसाफ़ दिलाने के लिए आंदोलित थे और सड़कों पर संघर्ष कर रहे थे वही लोग आज सत्ता में हैं और इन के राज में हर दिन एक निर्भया हवस की भेंट चढ़ती जा रही है।* *एक कारण हमारा पाठ्यक्रम और एजुकेशन सिस्टम भी है। पूरे पाठ्यक्रम में इंसान दोस्ती, महिलाओं का सम्मान, बहनों की इज़्ज़त-आबरू की हिफ़ाज़त जैसे महत्वपूर्ण विषय पर कोई किताब पाठ्यक्रम में शामिल ही नहीं है, और यदि है भी तो पढ़ाई नहीं जाती। इसके विपरीत कामवासना को उत्तेजित करने वाले स्रोतों की भरमार है, उदहारण के तौर पर यूनिफॉर्म के नाम पर नग्नता, कल्चरल प्रोग्राम के नाम पर डांस, अधिकांश विद्यालयों में पुरुष शिक्षकों का महिला शिक्षिकाओं के साथ प्रेम प्रसंग आदि। आज ना वह शिक्षक हैं जो अपने छात्रों को अनुशासन और नैतिक मूल्यों की तालीम देते थे। ना वह मां बाप हैं जो अपने बच्चों पर नज़र रखते थे। एजुकेशन सिस्टम की इस ख़राबी ने इंसानियत को हैवानियत के मक़ाम पर ला कर खड़ा कर दिया है।*
*धर्म, ज़ात और पार्टियों के भेदभाव ने भी अपराधियों के हौसले बढ़ा दिए हैं। जब इंसाफ़ और क़ानून नाफ़िज़ करने वाली संस्थाएं धर्म और जाति देख कर कारवाई करती हों, जहां सत्ताधारी पार्टी और विपक्ष के बीच इंसाफ़ के पैमाने बदल जाते हों, वहां सब से पहले जो चीज़ असुरक्षित हो जाती है वह इंसान की जान है। इंसानों में औरत सब से ज़्यादा ज़ुल्म की शिकार होती है। अगर मुजरिम सत्ताधारी पार्टी का हो तो उसके ख़िलाफ़ पहले तो मुक़दमे ही नहीं लिखे जाते और अगर किसी दबाव में आकर पुलिस FIR लिखने पर मजबूर भी होती है तो क़ानून की धाराएं हलकी कर दी जाती हैं। कभी कभी तो इस अंधेर नगरी में दोषियों के बदले निर्दोष को ही जेल भेज दिया जाता है।*
*अपराध के बढ़ते हुए आंकड़े ख़ास तौर पर औरतों के साथ बर्बरता एवं अत्याचार का एक कारण मीडिया भी है। मीडिया भी दो भाग में बंटी हुई है। एक गिरोह वह है जिसे हुकूमत की सरपरस्ती हासिल है, यह गिरोह बड़ा भी है और शक्तिशाली भी। दूसरा गिरोह जो सरकार की सरपरस्ती से वंचित है, वह बहुत छोटा है। उसकी आवाज़ दब जाती है या दबा दी जाती है। इसका मतलब यह है कि जब देश के सारे स्तंभ मीडिया, प्रशासन और अदालत मुजरिम की हौसला अफ़ज़ाई करने में मसरूफ़ हों तब आपकी बहू बेटियाँ कैसे सुरक्षित रह सकती हैं?*
*सवाल यह है कि इन हालात में हमारी क्या ज़िम्मेदारी है। क्या मात्र क़ानून बना देने भर से औरत को सुरक्षा और बराबरी के अधिकार मिल सकते हैं। क्या मात्र सड़कों, बसों और ऑटो रिक्शा पर नारे लिख देने से औरत का सम्मान और उसकी गरिमा को बाक़ी रखा जा सकता है ? क्या 'महिला दिवस’ मना लेने से औरत महफ़ूज़ हो जाती है? या उसके लिए हमें अपनी मानसिकता, दिल और दिमाग़ की तरबियत करना होगी। जहां औरत के बारे में गंदे और बुरे ख़यालात जन्म लेते हैं? क्या ऐसे हालात में हम को अपने पाठ्यक्रम में स्त्रियों की पवित्रता और गरिमा को समझने वाले अध्याय को शामिल नहीं करना चाहिए?*
*महिलाओं को यह भी समझना चाहिए कि उनके पास उनकी जान से प्यारी उनकी इज़्ज़त-आबरू है। स्त्रियों को उन पाखंडियों से चौकन्ना रहने की ज़रुरत है, जो उनकी आज़ादी का आंदोलन अपने कामवासना को सुख पहुँचाने के लिए चलाते हैं। वास्तव में उन्हें महिलाओं से कोई हमदर्दी नहीं होती। जब एक ऐसी लड़की जो ख़ुद दूसरों को सुरक्षा देने की ट्रेनिंग ले चुकी हो, वही लड़की एक ऐसे क्रूर और ज़ालिम के हवस का शिकार हो जाती है जो क़ानून का मुहाफ़िज़ है तो उस से समाज की बाक़ी दूसरी बहन बेटियों की हिफ़ाज़त का सवाल बेमानी (अर्थहिन) हो जाता है।*
*जब इंसानियत की इज़्ज़त के मुहाफ़िज़ ही शोषण करने और उनकी आबरू के लुटेरे बन जाएं तो आम और मनचले आवारा लड़कों से किसी प्रकार के संस्कार और अनुशासन की उम्मीद कैसे की जा सकती है? आवश्यक है कि सत्ताधारी शक्तियां उन पॉलिसियों पर पुनर्विचार करें, जिन के कारण देश में अश्लीलता और बेहयाई में इज़ाफ़ा हो रहा हैं। क़ानून के मुहाफ़िज़ और अद्ल व इंसाफ़ के अलम्बरदार भी विश्लेषण करें कि आख़िर मुजरिमों और अपराधियों का साहस क्यों बढ़ता जा रहा है। आज जो सत्ता के नशे में मगन हैं वह भी ना भूलें कि उनकी बच्चियां सुरक्षित हैं। जब भेड़िये के मुंह को इंसान के ख़ून का मज़ा मिल जाता है तो वह अपनी भूख मिटाने के लिए मालिक पर भी हमला कर देता है।*
ताज़ातरीन ख़बरें पढ़ने के लिए आप वतन समाचार की वेबसाइट पर जा सक हैं :
https://www.watansamachar.com/
उर्दू ख़बरों के लिए वतन समाचार उर्दू पर लॉगिन करें :
http://urdu.watansamachar.com/
हमारे यूट्यूब चैनल को सब्सक्राइब करना न भूलें :
https://www.youtube.com/c/WatanSamachar
ज़माने के साथ चलिए, अब पाइए लेटेस्ट ख़बरें और वीडियो अपने फ़ोन पर :
आप हमसे सोशल मीडिया पर भी जुड़ सकते हैं- ट्विटर :
https://twitter.com/WatanSamachar?s=20
फ़ेसबुक :

यदि आपको यह रिपोर्ट पसंद आई हो तो आप इसे आगे शेयर करें। हमारी पत्रकारिता को आपके सहयोग की जरूरत है, ताकि हम बिना रुके बिना थके, बिना झुके संवैधानिक मूल्यों को आप तक पहुंचाते रहें।
Support Watan Samachar
100 300 500 2100 Donate now






Enter your email address to subscribe and receive notifications of latest News by email.
Enter your email address to subscribe and receive notifications of latest News by email.