जामिया मिल्लिया इस्लामिया के संस्कृत विभाग में 'विद्यापति: समय से संवाद’ पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया. अखिल भारतीय मिथिला संघ की मैथिली शोध पत्रिका ‘तीरभुक्ति’ एवं आलोचना की अर्धवार्षिक पत्रिका ‘हस्तांक’ के संयुक्त तत्वावधान में यह आयोजन हुआ.
संगोष्ठी में जयदेव कृत गीतगोविन्दम तथा विद्यापति पदावली के परिपेक्ष में विचार-विमर्श किया गया.
संगोष्ठी में विषय को लेकर बीज व्यक्तव्य देते हुए जामिया मिल्लिया इस्लामिया के हिन्दी विभाग के प्रो. चंद्रदेव यादव ने कहा कि विद्यापति को लेकर काफी शोध हुए हैं और हर बार उनके रचना कर्म का नया रूप पाठकों को मिलता है. विद्यापति से जुड़े कई मिथक भी लोगों के सामने हैं.
इस अवसर पर जेएनयू के प्रोफ़ेसर एवं प्रसिद्द आलोचक प्रो. देवशंकर नवीन ने कहा कि विद्यापति का कृतित्व इतना व्यापक है कि उन पर आधारित दन्त कथाओं कहानियां उनसे कहीं आगे बढ़ गईं. जबकि यथार्थ में उनकी गीत और कविताओं पर बातचीत करना ज्यादा प्रासंगिक है.
शोध छात्रा स्वाति चौधरी ने विद्यापति के गीतों में स्त्री की पीड़ा को सामने रखा.
दिल्ली विवि के डॉ. प्रेम तिवारी ने विद्यापति की रचना और प्रो. चंद्रदेव प्रसाद की विद्यापति की पुस्तक पर अपना विचार रखा.
दिल्ली विवि के प्राध्यापक और प्रसिद्ध आलोचक डॉ. बजरंग बिहारी तिवारी ने विद्यापति को लेकर कहा कि वे जिस तरह मिथिला के समाज को देखते हैं, वह किसी दूसरे के पदावलियों में नहीं मिलता. विद्यापति ने अपने लेखन में संस्कृत को न चुनकर मैथली को चुना, यह एक साहसिक कार्य था.
इस अवसर पर हिंदी विभाग के प्रो. नीरज कुमार ने विद्यापति के गीतों में आए कई शब्दों के व्यापक मायने को श्रोताओं के सामने रखा.
अखिल भारतीय मिथिला संघ के अध्यक्ष विजय चंद्र झा ने विद्यापति से शिवभक्ति और श्रृंगार पर अपना विचार रखा और विद्यापति के नाम पर फ़ैली कुरीतियों की चर्चा की.
इस अवसर पर हिंदी विभाग में अध्यापक डॉ. मुकेश मिरोठा ने भी प्रो. चंद्रदेव यादव की रचना प्रक्रिया को लेकर बताया कि उन्होंने किस तरह विद्यापति को लेकर गंभीर कार्य किया, जो पुस्तक के रूप में सामने आया है.
संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे जामिया मिल्लिया इस्लामिया के हिंदी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. अब्दुल बिस्मिल्लाह ने कहा कि विद्यापति से जुड़े तमाम पक्षों के लेकर विभिन्न वक्ताओं ने अपनी बात रखी, इससे शोध छात्रों और शिक्षकों को विद्यापति को लेकर नए सिरे से शोध करने के लिए विवश करेगा.
इस अवसर पर संस्कृत विभाग के अध्यक्ष प्रो. गिरीश चन्द्र पंत, हिन्दी विभाग के प्रो. हेमलता महेश्वर, डॉ. अजय नावरिया, हस्तांक के संपादक सुशील द्विवेदी भी मौजूद थे.
कार्यक्रम का मंच संचालन ‘तीरभुक्ति’ के संपादक विनीत उत्पल ने किया. धन्यवाद ज्ञापन कार्यक्रम संयोजक डॉ. अदनान बिस्मिल्लाह ने किया. इस मौके पर सभी वक्ताओं को स्मृति चिन्ह भी प्रदान क्या गया. इस अवसर पर फहीम अहमद, ओवैश पाशा, मुकुन्द सहित जामिया मिल्लिया इस्लामिया के विभिन्न विभागों के तमाम शोधार्थी मौजूद थे.
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